सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सोच के देखो !

नफरत का यह सिलसिला,

कब तक चलता रहेगा?

धरम के नाम से हैवानियत,

कब तक यूँ ही चलेगा?

ताक़त के गुरुर में मज़हब को,

नफरत का जरिया बना दिया, 

इंसानियत रंग दी खून में, और 

धरती को जंग का मैदान बना दिया!

इस मारने, मिटाने के लड़ाई मेँ,

कुछ, अपनों को भुला बैठे हैं!

धर्म का पट्टी बांध आँखों मेँ,

कुछ, रिश्तों से ही ऐंठे हैं!

खून की इस होली में,

अपनी चलाई गोली में,

मानवता ही मर जायेगा !

किस के लिए लड़े यह जंग,

सब अपने ही तो मरेंगे, 

और तू ने क्या सोचा हे,

तू ही जिन्दा बच जायेगा! 

सोच, उसके बाद का,

क्या नज़ारा होगा! 

लाशें ही लाशें हर तरफ,

अपनों का बिखरा होगा! 

एक चंडाशोक था संसार में, 

उसे तो मुक्ति मिल गयी। 

मिटा दिया होगा जब संसार,

तुम्हे रास्ता कौन दिखायेगा!

जिन्दा रह भी गया तो सोच,

अकेले धरती पे क्या करेगा! 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उत्कल दिवस: ओडिशा के इतिहास और विकास का यात्रा।

  1936, ओडिशा राज्य एक विशिष्ट राजनीतिक इकाई के रूप में उभरा, जो भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। उत्कल दिवस, या ओडिशा दिवस, राज्य की स्थापना का जश्न मनाता है और इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक उपलब्धियों का जश्न मनाता है। यह लेख कलिंग के रूप में इसकी प्राचीन जड़ों से लेकर इसके आधुनिक विकास तक ओडिशा के इतिहास पर प्रकाश डालता है, और राज्य की नियति को आकार देने में इसके नेताओं और लोगों के योगदान पर प्रकाश डालता है। ओडिशा का जन्म: ओडिशा का जन्म 1 अप्रैल, 1936 को हुआ था, जब इसे संयुक्त बंगाल-बिहार-ओडिशा प्रांत से अलग किया गया था। राज्य का गठन उसके लोगों की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर किया गया था, जिससे यह इस तरह के आधार पर स्थापित होने वाला पहला भारतीय राज्य बन गया। "ओडिशा" नाम राज्य के मध्य क्षेत्र में रहने वाली ओड्रा जनजाति से लिया गया था। संस्थापक: बेरिस्टर मधुसूदन दास उत्कल की नींव एक दूरदर्शी नेता और समाज सुधारक मधुसूदन दास के अथक प्रयासों के कारण है। 28 अप्रैल, 1848 को जन्मे मधुसूदन दास ने अपना जीवन ओडिशा के लोगों के उत्थान के लिए स...

जाति जनगणना: भारत के लिए कितना जरूरी कदम?

जाति सदियों से भारत के सामाजिक ताने-बाने का एक अभिन्न अंग रही है, जो सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता, राजनीतिक समीकरणों और सार्वजनिक नीतियों को गहराई से प्रभावित करती रही है। हाल के वर्षों में, जाति जनगणना कराने पर बहस ने गति पकड़ ली है, विभिन्न राजनीतिक दल, विशेषकर कांग्रेस, इसकी वकालत कर रहे हैं। यह लेख भारत में जाति जनगणना की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है, इसके फायदे और नुकसान की खोज करता है, और कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए राजनीतिक निहितार्थों की जांच करता है। जाति जनगणना क्या है? जाति जनगणना में जनसंख्या की जाति संरचना पर डेटा एकत्र करना शामिल है। अंतिम जाति-आधारित डेटा संग्रह 1931 में किया गया था। नए सिरे से जाति जनगणना की मांग बढ़ रही है, समर्थकों का तर्क है कि यह विभिन्न जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की स्पष्ट तस्वीर प्रदान करेगा, अधिक प्रभावी नीति निर्माण में मदद करेगा और कार्यान्वयन। जाति जनगणना के फायदे ! नीति निर्माण के लिए सटीक डेटा: एक जाति जनगणना विभिन्न जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर सटीक डेटा प्रदान कर सकती है। इससे समाज के सबसे वंचित वर्गों को अधिक प्रभावी ढंग से ल...

राजस्थान दिवस: वीरता और विरासत की भूमि को श्रद्धांजलि !

  राजस्थान दिवस पर, हम इस जीवंत भारतीय राज्य के समृद्ध इतिहास, संस्कृति और विरासत का जश्न मनाते हैं। राजस्थान, जिसे "राजाओं की भूमि" के रूप में जाना जाता है, इतिहास में डूबा हुआ एक क्षेत्र है, जिसकी विरासत हजारों साल पुरानी है। इस लेख में, हम राजस्थान की दिलचस्प कहानी, इसकी स्थापना और मुगल काल से लेकर भारत की स्वतंत्रता और उससे आगे की भूमिका तक का पता लगाएंगे। राजस्थान की स्थापना 30 मार्च 1949 को भारत गणराज्य के एक राज्य के रूप में की गई थी। राज्य का गठन पूर्व राजपूताना एजेंसी और अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र सहित 22 रियासतों और क्षेत्रों को मिलाकर किया गया था। "राजस्थान" नाम का अर्थ है "राजाओं की भूमि", जो विभिन्न राजपूत राजवंशों द्वारा शासित राज्यों के संग्रह के रूप में क्षेत्र के इतिहास को दर्शाता है। मुगल काल के दौरान, राजस्थान अपनी सामरिक स्थिति और संसाधनों के कारण एक महत्वपूर्ण क्षेत्र था। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ जैसे सम्राटों के नेतृत्व में मुगल साम्राज्य का इस क्षेत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। ये शासक कला, वास्तुकला और साहित्य के संरक्षण के लिए जाने जा...