कभी-कभी एक मामूली सी बात घर की दीवारों का रंग बदल देती है। ज़रूरत की धूप चढ़े तो रिश्तों की छाया छोटी हो जाती है, और जो अपने लगते थे वे भी अनजाने रास्तों पर मुड़ जाते हैं। अब भरोसा भी जेब में रखा सिक्का सा लगता है, किसी की हथेली में जाते ही उसकी कीमत बदल जाती है। रब ने जितनी नेमतें दीं उतनी ही चाहतों की आग भड़कती गई, और बाज़ार की तरह लोगों के दिलों में भी सौदे होने लगे। कल जिन बातों को सच की रोशनी मिलनी थी, आज वही खबरें काग़ज़ की स्याही में बिकती दिखीं। और देखो… मेरी बदनाम सी बैठकों में वे भी चले आए, जिन्हें कभी ईमान की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठा देखा था। क्या कभी ऐसा दिन आएगा? जब सच, इंसानियत और ईमानदारी फिर से समाज की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठेंगी? — ✍️ आशुतोष पाणिग्राही।
सालों की परवरिश हम यूँ ही भुला बैठते हैं, जिन्होंने बोलना सिखाया, हम आज उन्हें चुप कराते हैं। कितने चाव से गिनती के अंक हमें रटाए थे, अब उनकी गलतियाँ गिन-गिन कर हम सुनाते हैं। सोते नहीं थे जब तक हमारी आँखें न बंद होतीं, आज हमारी वजह से वो रातों को सो नहीं पाते हैं। हर दर्द में हमारे आँसू अपनी हथेली से पोंछते थे, अब हमारी बेरुख़ी पर ख़ुद आँसू बहाते हैं। जब जी चाहे, हक़ समझ कर उनसे लिपट जाते थे, अब उनका मन चाहे तो हम पास आने से कतराते हैं। हमारे दिए घाव भी दिल में छुपाकर रखते हैं, पर हमारी अच्छाइयाँ सबके सामने फख़्र से कहते हैं। देर अभी भी नहीं हुई है, हम बदल सकते हैं, गलती किसी की भी हो, हाथ जोड़ कर मान सकते हैं। गले लगाकर पलकों पर बिठाएँ, यही फ़र्ज़ निभाएँ, हमारे इमरोज़ हैं वो, सालों की परवरिश को यूँ न भुलाएं।