शहर की रोशनी में अक्सर आँखें चौंधिया जाती हैं, पर दिल… वो अब भी किसी कच्चे आँगन की छाँव ढूंढता है। यूँ पुरखों की ज़मीन सिक्कों में मत तौलो, उसमें दबी होती है दादी की हँसी, और बरसात में भीगती यादों की खुशबू। शहर बुलाता है… अपनी तेज़ रफ़्तार, ऊँची इमारतों के साथ, पर हर ऊँचाई के बाद एक थकान भी तो आती है। कभी लौटना पड़े… तो दरवाज़ा बंद न मिले, इसलिए गाँव में भी एक घर बनाकर रखो— जहाँ समय ठहरता है, और रिश्ते साँस लेते हैं। क्योंकि आख़िर में, इंसान नहीं… उसकी जड़ें उसे वापस बुलाती हैं। — ✍️ आशुतोष पाणिग्राही।
कभी-कभी एक मामूली सी बात घर की दीवारों का रंग बदल देती है। ज़रूरत की धूप चढ़े तो रिश्तों की छाया छोटी हो जाती है, और जो अपने लगते थे वे भी अनजाने रास्तों पर मुड़ जाते हैं। अब भरोसा भी जेब में रखा सिक्का सा लगता है, किसी की हथेली में जाते ही उसकी कीमत बदल जाती है। रब ने जितनी नेमतें दीं उतनी ही चाहतों की आग भड़कती गई, और बाज़ार की तरह लोगों के दिलों में भी सौदे होने लगे। कल जिन बातों को सच की रोशनी मिलनी थी, आज वही खबरें काग़ज़ की स्याही में बिकती दिखीं। और देखो… मेरी बदनाम सी बैठकों में वे भी चले आए, जिन्हें कभी ईमान की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठा देखा था। क्या कभी ऐसा दिन आएगा? जब सच, इंसानियत और ईमानदारी फिर से समाज की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठेंगी? — ✍️ आशुतोष पाणिग्राही।