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संदेश

शीर्षक: चेहरे मौसम की तरह

  कभी-कभी एक मामूली सी बात घर की दीवारों का रंग बदल देती है। ज़रूरत की धूप चढ़े तो रिश्तों की छाया छोटी हो जाती है, और जो अपने लगते थे वे भी अनजाने रास्तों पर मुड़ जाते हैं। अब भरोसा भी जेब में रखा सिक्का सा लगता है, किसी की हथेली में जाते ही उसकी कीमत बदल जाती है। रब ने जितनी नेमतें दीं उतनी ही चाहतों की आग भड़कती गई, और बाज़ार की तरह लोगों के दिलों में भी सौदे होने लगे। कल जिन बातों को सच की रोशनी मिलनी थी, आज वही खबरें काग़ज़ की स्याही में बिकती दिखीं। और देखो… मेरी बदनाम सी बैठकों में वे भी चले आए, जिन्हें कभी ईमान की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठा देखा था। क्या कभी ऐसा दिन आएगा?  जब सच, इंसानियत और ईमानदारी  फिर से  समाज की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठेंगी? — ✍️ आशुतोष पाणिग्राही।
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परवरिश का क़र्ज़: अनकहा एहसान!

सालों की परवरिश हम यूँ ही भुला बैठते हैं, जिन्होंने बोलना सिखाया, हम आज उन्हें चुप कराते हैं। कितने चाव से गिनती के अंक हमें रटाए थे, अब उनकी गलतियाँ गिन-गिन कर हम सुनाते हैं। सोते नहीं थे जब तक हमारी आँखें न बंद होतीं, आज हमारी वजह से वो रातों को सो नहीं पाते हैं। हर दर्द में हमारे आँसू अपनी हथेली से पोंछते थे, अब हमारी बेरुख़ी पर ख़ुद आँसू बहाते हैं। जब जी चाहे, हक़ समझ कर उनसे लिपट जाते थे, अब उनका मन चाहे तो हम पास आने से कतराते हैं। हमारे दिए घाव भी दिल में छुपाकर रखते हैं, पर हमारी अच्छाइयाँ सबके सामने फख़्र से कहते हैं। देर अभी भी नहीं हुई है, हम बदल सकते हैं, गलती किसी की भी हो, हाथ जोड़ कर मान सकते हैं। गले लगाकर पलकों पर बिठाएँ, यही फ़र्ज़ निभाएँ, हमारे इमरोज़ हैं वो, सालों की परवरिश को यूँ न भुलाएं।

दुनिया के आईने में – एक शायर 🌙🖤

हर दिल की दास्ताँ हर शख्स को दिखानी नहीं, कुछ जज़्बात ऐसे हैं जो बयान की जानी नहीं। मत बनो वो दस्तावेज़, जिसे सब पढ़ जाएँ, जहालत के दौर में हर पन्ना फाड़ जाएँ। जब फ़ायदों की फ़सल थी, हर कोई साथ था, काम खत्म होते ही, सब चेहरे बदल गए। मोहब्बत को तौलते हैं वो बंदे ज़माने वाले, नफ़ा-नुक़सान की नज़र से देखते हैं खामोश क़िस्से। ज़ख़्म वही देते हैं, जो हँस के थाम लेते हैं हाथ, मोहब्बत की क़ीमत कभी नहीं समझ पाते साथ। रिश्तों की दुकान लगी है, इंसानियत कहीं खो गई, सुकून की तलाश में, खुद से दूर हो गया । चुप्पी को सँवारो अपनी सबसे बड़ी ताक़त बना, हर शोर में छुपा है कोई ग़म, कोई कहानी अधूरी। खुली किताब न बनो, हर किसी के लिए यहाँ, इस अंधेरे सफ़र में, सिर्फ़ वो जलते हैं जो समझें। — ✍️ आशुतोष पाणिग्राही।

🌟 हौसलों की उड़ान 🌟

जो चल पड़े सवेरा देख, हर राह नहीं वो पाए, जो ठान ले इरादा पक्का, मंज़िल वही तो लाए। हर तेज़ उड़ान का मतलब, मंज़िल पाना नहीं होता, जो धरती से जुड़ा रहे, वही आसमान की ऊँचाई छूता। जो थक कर बैठ जाए, वो रुकावट में खो जाए, जो दृढ़ संकल्प रखे दिल में, वही सीतारा बन जाए। वक़्त से पहले जागना ही समझदारी की बात नहीं, धैर्य से जो खेले बाज़ी, हार उसकी औकात नहीं। कई बार देर से चलने वाला, सबसे आगे मिलता है, जो जुनून से जले अंदर, वही दीपक बन जाता है। जीत उसी की होती है जो, हालातों से ना घबराए, वक़्त, मेहनत और जज़्बा, जब साथ चले — कमाल दिखाए। ✨🔥 — ✍️ आशुतोष पाणिग्राही।

उम्मीदों की शाम

उम्मीदों की शाम **************** सोमवार की शाम कुछ थकी-थकी सी है, रात की चादर में सिमटी हुई सी है, दिनभर की दौड़ में उलझे हुए हैं हम, पर उम्मीदों की लौ अब भी जली हुई सी है। शहर की रौशनी में हल्की खामोशी है, दिल में कहीं थोड़ी सी बेकरारी सी है, सपने जो सुबह के संग देखे थे हमने, वो अब भी निगाहों में जागी हुई सी है। शाम की ठंडक में सुकून थोड़ा है, कल की सुबह का ख्याल अभी ज़िंदा है, सोचते हैं कि थकान मिटा लें आज की, क्योंकि हर दिन के साथ एक नया सपना है। शुभ संध्या #शुभ_संध्या #GoodEvening

कांग्रेस के शासनकाल में भारत को मुस्लिम देश बनाने का प्रयास: संविधान और कानूनों के माध्यम से मुस्लिम तुष्टीकरण !

कांग्रेस के शासनकाल में भारत को मुस्लिम देश बनाने का प्रयास: संविधान और कानूनों के माध्यम से मुस्लिम तुष्टीकरण ! कांग्रेस का शासनकाल भारतीय राजनीतिक इतिहास में सबसे लंबे समय तक रहा है, और इसी दौरान भारत में कई नीतिगत निर्णय लिए गए जो मुस्लिम समुदाय के पक्ष में प्रतीत होते हैं। हालाँकि, कांग्रेस ने सीधे तौर पर कभी भारत को मुस्लिम देश घोषित नहीं किया, लेकिन उसके कई कदम और कानूनी फैसले इस दिशा में संकेत देते हैं। संविधान के माध्यम से मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियाँ अपनाने और कई विशेष कानूनों को पारित करने की कोशिशें की गईं, जिनका उद्देश्य स्पष्ट रूप से मुस्लिम समुदाय को लाभ पहुंचाना था। इस लेख में, हम विस्तार से उन कानूनों, नीतियों, और घटनाओं पर चर्चा करेंगे जो कांग्रेस के शासनकाल में मुस्लिम समुदाय के पक्ष में पारित किए गए। ये घटनाएँ यह दिखाती हैं कि किस प्रकार कांग्रेस ने बार-बार भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भेदभाव करते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाई। 1. संविधान सभा और धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा भारत की संविधान सभा में धर्मनिरपेक्षता पर काफी लंबी बहस हुई। कांग्रेस ने संविधान मे...

जाति जनगणना: भारत के लिए कितना जरूरी कदम?

जाति सदियों से भारत के सामाजिक ताने-बाने का एक अभिन्न अंग रही है, जो सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता, राजनीतिक समीकरणों और सार्वजनिक नीतियों को गहराई से प्रभावित करती रही है। हाल के वर्षों में, जाति जनगणना कराने पर बहस ने गति पकड़ ली है, विभिन्न राजनीतिक दल, विशेषकर कांग्रेस, इसकी वकालत कर रहे हैं। यह लेख भारत में जाति जनगणना की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है, इसके फायदे और नुकसान की खोज करता है, और कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए राजनीतिक निहितार्थों की जांच करता है। जाति जनगणना क्या है? जाति जनगणना में जनसंख्या की जाति संरचना पर डेटा एकत्र करना शामिल है। अंतिम जाति-आधारित डेटा संग्रह 1931 में किया गया था। नए सिरे से जाति जनगणना की मांग बढ़ रही है, समर्थकों का तर्क है कि यह विभिन्न जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की स्पष्ट तस्वीर प्रदान करेगा, अधिक प्रभावी नीति निर्माण में मदद करेगा और कार्यान्वयन। जाति जनगणना के फायदे ! नीति निर्माण के लिए सटीक डेटा: एक जाति जनगणना विभिन्न जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर सटीक डेटा प्रदान कर सकती है। इससे समाज के सबसे वंचित वर्गों को अधिक प्रभावी ढंग से ल...