शहर की रोशनी में
अक्सर आँखें चौंधिया जाती हैं,
पर दिल…
वो अब भी किसी कच्चे आँगन की छाँव ढूंढता है।
यूँ पुरखों की ज़मीन
सिक्कों में मत तौलो,
उसमें दबी होती है
दादी की हँसी,
और बरसात में भीगती यादों की खुशबू।
शहर बुलाता है…
अपनी तेज़ रफ़्तार, ऊँची इमारतों के साथ,
पर हर ऊँचाई के बाद
एक थकान भी तो आती है।
कभी लौटना पड़े…
तो दरवाज़ा बंद न मिले,
इसलिए
गाँव में भी एक घर बनाकर रखो—
जहाँ समय ठहरता है,
और रिश्ते साँस लेते हैं।
क्योंकि आख़िर में,
इंसान नहीं…
उसकी जड़ें उसे वापस बुलाती हैं।
— ✍️ आशुतोष पाणिग्राही।
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