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नारी: एक प्यारी सी रचना।

माँ, बहिन, पत्नी, बेटी  नारी तेरे कितने रूप! वरदान है इंसान के लिए, तेरे सारे, सारे स्वरुप।  माँ बनके जन्म दिया, दुनिया का हर कष्ट सहा, बहिन के रूप में दोस्त बनके, जाने कितने नखरे उठाये! पत्नी बनके ईश्वर बना दिया! अपनों से बढ़के प्यार किया, बनके बेटी जो जन्म लिया, हर सुख दुःख में साथ दिया।  रमणी, कामिनी, कान्ता, बनिता जाने कितने नाम हैं तेरे, स्त्री, अबला, औरत, सुंदरी,नारी, जाने क्या क्या संसार पुकारे, तुझ ही से सृष्टि, तुझ ही से विनाश, तू ही न जाने, कितनी शक्तियां तेरे पास! दुनिया में सबसे शोषित,   दलित और उपेक्षित,  फिर भी तू चाहे सबका हित । दो कुलों की तू हितैषी, इसलिए तू दुहिता ! तू शक्ति, तू नारायणी, युगे युगे नारी तू सदा बंदिता। 

नेता और जनता

एक इंसान, दो रूप, एक नेता, जो माने खुद को देवता!  दूजी भोली भाली जनता, जो माने नेता देव स्वरुप! हम(जनता) मुर्ख और तुम मंत्री ! हम अकेले बेचारे और  तुम्हारे सेंकडो जंत्री तंत्री!  हम किस्मत के मारे, और  तुम किस्मत लिखने वाले संत्री! तुम्हारी प्रार्थना, सिर्फ एक दिन,  उसमे भी मैच फिक्सिंग! हम रोज़ करें पूजा, पाठ,  फिर भी रिजेक्ट एप्लीकेशन ! तुम एक बार जीतो, पांच साल का ऐश-ओ-आराम! खूब करो घोटाला, फेलाओ भ्रस्टाचार, फिर भी ताउम्र पेंशन, बिन काम ! हम एक बार जो तुम्हे जिताएं , फिर, जो हमारा जीना हाराम! गलती को रोयें, आँसुओं से धोएं, रोज़ लगाए तुम्हारा ही झंडू बाम! तुम पक्ष में हो या बिपक्ष में, काम से न कोई लेना देना! सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी भी हम,  उसपे तूम क़ुरबान करो हमारी ही जान! गिरगिट बदले रंग, आता मुसीबत देख, नेवले तुम, जो भटकाए सांप का केंचुल फेंक! नर तो तुच्छ है, नारायण भी सोचते होंगे, है भगवान्, क्या बनाया था मैंने, देख क्या बन गया इंसान!