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भारतीय संविधान में संशोधन की अत्यावश्यकता और तात्कालिकता !

    भारतीय संविधान, एक स्मारकीय दस्तावेज़, हमारे राष्ट्र की आकांक्षाओं और आदर्शों का प्रतीक है। हमारे संस्थापकों द्वारा सावधानीपूर्वक तैयार की गई, इसने अपने गोद लेने के बाद से शासन और न्याय के लिए रूपरेखा प्रदान की है। हालाँकि, अपने ऊंचे सिद्धांतों के बावजूद, संविधान कमियों और खामियों से अछूता नहीं है। इस लेख में, हम भारतीय संविधान की कमियों पर प्रकाश डालते हैं और हमारे देश के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों के समाधान के लिए संशोधन की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हैं। भारतीय संविधान में खामियाँ: आजादी के सात दशकों के बावजूद, भारत लगातार सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। गरीबी व्याप्त है, आबादी का एक बड़ा हिस्सा दिन में दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए भी संघर्ष कर रहा है। गरीबी उन्मूलन में विफलता हमारी सामाजिक कल्याण नीतियों की अपर्याप्तता को उजागर करती है और सुधार की तात्कालिकता को उजागर करती है। इसके अलावा, ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के इरादे से शुरू किया गया जाति-आधारित आरक्षण अपने इच्छित उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहा है। इसके बज...

नेता और जनता

एक इंसान, दो रूप, एक नेता, जो माने खुद को देवता!  दूजी भोली भाली जनता, जो माने नेता देव स्वरुप! हम(जनता) मुर्ख और तुम मंत्री ! हम अकेले बेचारे और  तुम्हारे सेंकडो जंत्री तंत्री!  हम किस्मत के मारे, और  तुम किस्मत लिखने वाले संत्री! तुम्हारी प्रार्थना, सिर्फ एक दिन,  उसमे भी मैच फिक्सिंग! हम रोज़ करें पूजा, पाठ,  फिर भी रिजेक्ट एप्लीकेशन ! तुम एक बार जीतो, पांच साल का ऐश-ओ-आराम! खूब करो घोटाला, फेलाओ भ्रस्टाचार, फिर भी ताउम्र पेंशन, बिन काम ! हम एक बार जो तुम्हे जिताएं , फिर, जो हमारा जीना हाराम! गलती को रोयें, आँसुओं से धोएं, रोज़ लगाए तुम्हारा ही झंडू बाम! तुम पक्ष में हो या बिपक्ष में, काम से न कोई लेना देना! सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी भी हम,  उसपे तूम क़ुरबान करो हमारी ही जान! गिरगिट बदले रंग, आता मुसीबत देख, नेवले तुम, जो भटकाए सांप का केंचुल फेंक! नर तो तुच्छ है, नारायण भी सोचते होंगे, है भगवान्, क्या बनाया था मैंने, देख क्या बन गया इंसान!