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परवरिश का क़र्ज़: अनकहा एहसान!

सालों की परवरिश हम यूँ ही भुला बैठते हैं,
जिन्होंने बोलना सिखाया, हम आज उन्हें चुप कराते हैं।

कितने चाव से गिनती के अंक हमें रटाए थे,
अब उनकी गलतियाँ गिन-गिन कर हम सुनाते हैं।

सोते नहीं थे जब तक हमारी आँखें न बंद होतीं,
आज हमारी वजह से वो रातों को सो नहीं पाते हैं।

हर दर्द में हमारे आँसू अपनी हथेली से पोंछते थे,
अब हमारी बेरुख़ी पर ख़ुद आँसू बहाते हैं।

जब जी चाहे, हक़ समझ कर उनसे लिपट जाते थे,
अब उनका मन चाहे तो हम पास आने से कतराते हैं।

हमारे दिए घाव भी दिल में छुपाकर रखते हैं,
पर हमारी अच्छाइयाँ सबके सामने फख़्र से कहते हैं।

देर अभी भी नहीं हुई है, हम बदल सकते हैं,
गलती किसी की भी हो, हाथ जोड़ कर मान सकते हैं।

गले लगाकर पलकों पर बिठाएँ, यही फ़र्ज़ निभाएँ,
हमारे इमरोज़ हैं वो, सालों की परवरिश को यूँ न भुलाएं।

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