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शीर्षक: चेहरे मौसम की तरह

  कभी-कभी एक मामूली सी बात घर की दीवारों का रंग बदल देती है। ज़रूरत की धूप चढ़े तो रिश्तों की छाया छोटी हो जाती है, और जो अपने लगते थे वे भी अनजाने रास्तों पर मुड़ जाते हैं। अब भरोसा भी जेब में रखा सिक्का सा लगता है, किसी की हथेली में जाते ही उसकी कीमत बदल जाती है। रब ने जितनी नेमतें दीं उतनी ही चाहतों की आग भड़कती गई, और बाज़ार की तरह लोगों के दिलों में भी सौदे होने लगे। कल जिन बातों को सच की रोशनी मिलनी थी, आज वही खबरें काग़ज़ की स्याही में बिकती दिखीं। और देखो… मेरी बदनाम सी बैठकों में वे भी चले आए, जिन्हें कभी ईमान की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठा देखा था। क्या कभी ऐसा दिन आएगा?  जब सच, इंसानियत और ईमानदारी  फिर से  समाज की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठेंगी? — ✍️ आशुतोष पाणिग्राही।